आयुर्वेद और योग के नैतिक और दार्शनिक पहलुओं को उपाध्याय जी के अंत्योदय और लोकहित के सिद्धांत से जोड़ा गया है।
योग का नैतिक आधार ‘यम-नियम’ पर है जो व्यक्ति को अनुशासन, संयम और सदाचार की ओर प्रेरित करता है।
उपाध्याय जी का अंत्योदय दर्शन भी यही सिखाता है कि समाज के अंतिम व्यक्ति तक सुख और स्वास्थ्य पहुँचना ही वास्तविक मानवधर्म है।
योग का अर्थ “संयोग” है — आत्मा और परमात्मा, व्यक्ति और समाज का एकत्व। उपाध्याय जी ने इसी एकत्व को जीवन और राष्ट्र का आधार माना।

उन्होंने कहा —
- “जब तक व्यक्ति अनुशासित और संयमित नहीं, तब तक राष्ट्र की आत्मा प्रकट नहीं हो सकती।”
- योग के “यम, नियम, आसन, ध्यान” जैसे अनुशासनात्मक तत्त्व उनके “स्वावलंबन और आत्मशक्ति” के सामाजिक दर्शन से मेल खाते हैं।
- आयुर्वेद न केवल चिकित्सा प्रणाली है बल्कि यह ‘धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष’ के चार पुरुषार्थों में संतुलन की शिक्षा देता है।
- आयुर्वेद का उद्देश्य — “धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष” की प्राप्ति हेतु स्वस्थ जीवन — वही एकात्म मानववाद की आत्मा है।
- उपाध्याय जी का अंत्योदय दर्शन भी यही सिखाता है कि समाज के अंतिम व्यक्ति तक सुख और स्वास्थ्य पहुँचना ही वास्तविक मानवधर्म है।
- अंत्योदय और आयुर्वेद-योग की जनकल्याण दृष्टि
- आयुर्वेद लोकहित को चिकित्सा का लक्ष्य मानता है, योग व्यक्ति के भीतर समरसता उत्पन्न कर समाज में समन्वय स्थापित करता है।